| कैसे
भूलूं वह एक रात |
| तन
हरर्सिंगार मन-पारिजात |
| छुअनें, सिहरन, पुलकन, कम्पन |
| अधरो से
अंतर हिला दिया |
| तुमने
जाने क्या पिला दिया |
|
| तन की
सारी खिडकिया खोलकर |
| मन आया
अगवानी मै |
| चेतना
और सन्यम भटके |
| मन की
भोली नादानी में |
| थी तेज
धार, लहरे अपार, भवरे थी |
| कठिन, मगर फिर भी |
| डरते-डरते
मैं उतर गया |
| नदिया
के गहरे पानी मै |
| नदिया
ने भी जोबन-जीवन |
| जाकर
सागर मैं मिला दिया |
| तुमने
जाने क्या पिला दिया |
|
| जिन
जख्मो की हो दवा सुलभ |
| उनके
रिसते रहने से क्या |
| जो बोझ
बने जीवन-दर्शन |
| उसमे
पिसते रहने से क्या |
| हो
सिंह्दवार पर अंधकार |
| तो जगमग
महल किसे दीखे |
| तन पर
काई जम जाये तो |
| मन को
रिसते रहने से क्या |
| मेरी
भटकन पी गये स्वयम |
| मुझसे
मुझको क्यो मिला दिया |
| तुमने
जाने क्या पिला दिया |
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